पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत की बासमती चावल इंडस्ट्री पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ईरान, सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे देशों पर निर्भर इस निर्यात उद्योग को शिपमेंट में देरी, बढ़ती लागत और भुगतान में रुकावट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि निर्यातकों को अपने माल को गंतव्य तक पहुंचाने में पहले से ज्यादा समय लग रहा है, क्योंकि सुरक्षा कारणों से जहाजों को लंबा और वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
भारत की बासमती इंडस्ट्री एक बड़ा सेक्टर है, जिसकी सालाना वैल्यू लगभग 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक मानी जाती है। हर साल करीब 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात होता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में जाता है। ऐसे में इन क्षेत्रों में बढ़ते तनाव का सीधा असर भारतीय व्यापार पर पड़ना स्वाभाविक है। अगर समय पर माल नहीं पहुंचता, तो इसका असर केवल निर्यातकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि किसानों की आय पर भी पड़ता है।
इस संकट के बीच सबसे बड़ी समस्या बढ़ती लॉजिस्टिक लागत बन गई है। पहले जहां एक कंटेनर का भाड़ा कुछ सौ डॉलर के आसपास होता था, वहीं अब यह कई गुना बढ़ चुका है। इसके अलावा, कंपनियों द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्क—जैसे वॉर रिस्क और इमरजेंसी चार्ज—ने लागत को और बढ़ा दिया है। कई मामलों में जहाजों को सीधे गंतव्य तक जाने के बजाय बीच के बंदरगाहों पर रोका जा रहा है, जिससे स्टोरेज और हैंडलिंग खर्च भी बढ़ रहा है।
इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों पर देखने को मिल रहा है, जो देश के कुल बासमती उत्पादन का बड़ा हिस्सा संभालते हैं। मांग में कमी और निर्यात में बाधाओं के कारण प्रीमियम किस्मों की कीमतों में गिरावट आई है, जिससे किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। खास बात यह है कि बासमती चावल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू नहीं होता, इसलिए किसान पूरी तरह बाजार और निजी व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कीमतों में गिरावट सीधे उनकी आमदनी को प्रभावित करती है।
उत्तर प्रदेश में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। वहां के निर्यातकों का कहना है कि खाड़ी देशों के लिए शिपमेंट में भारी गिरावट आई है, क्योंकि रूट महंगे और अनिश्चित हो गए हैं। इसके चलते मिलों और व्यापारियों ने भुगतान में देरी शुरू कर दी है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का संकट पैदा हो रहा है।
मध्य प्रदेश में भी इस संकट का असर तेजी से बढ़ रहा है, जहां बड़ी मात्रा में बासमती चावल बंदरगाहों पर फंसा हुआ है। निर्यातकों का कहना है कि मांग बनी रहने के बावजूद लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण वे समय पर माल नहीं भेज पा रहे हैं। खासकर त्योहारों और धार्मिक अवसरों के दौरान बढ़ने वाली मांग का फायदा भी इस बार नहीं उठाया जा पा रहा है।
हालांकि, स्थिति को संभालने के लिए कुछ वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा रहा है और सरकार भी राहत के उपायों पर काम कर रही है, जैसे फ्रेट सब्सिडी और जोखिम कवर। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो इसका असर अगले सीजन की बुवाई और किसानों को मिलने वाली कीमतों पर भी पड़ेगा।
कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया का यह तनाव केवल एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर भारत के कृषि और निर्यात सेक्टर पर भी गहराई से पड़ रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्थिति कितनी जल्दी सामान्य होती है और इससे जुड़े सभी हितधारकों को कितनी राहत मिल पाती है।

